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गंगाजल का वैज्ञानिक रहस्य: महाकुंभ में 28 करोड़ लोगों ने स्नान किया फिर ही क्यों मैली नहीं हुई गंगा

Maha Kumbh 2025: 28 करोड़ लोगों ने स्नान किया फिर ही क्यों मैली नहीं हुई गंगा

By NAGPUR BUREAU, Newsfirst24.in

Published: January 31, 2025, 08:20 PM

🔬 NEERI वैज्ञानिकों ने किया खुलासा: गंगाजल में मौजूद अद्भुत तत्व खुद को शुद्ध रखने की क्षमता देते हैं!

Scientific mystery of Ganga water: 28 crore people took bath in Maha Kumbh, then why did Ganga not become dirty

गंगा नदी: जल नहीं, जीवन है!

गंगाजल का वैज्ञानिक रहस्य: महाकुंभ में 28 करोड़ लोगों ने स्नान किया फिर ही क्यों मैली नहीं हुई गंगा

प्रयागराज।  प्रयागराज में गुरुवार तक 28 करोड़ लोगों ने एक ही जगह स्नान किया। इसके बाद भी गंगा जरा भी मैली नहीं हुई। वह आज भी साफ बनी हुई है जैसे पहले थी। इस बात को लेकर आम लाेगों में जिज्ञासा है। सामान्यत: दूसरे स्थानों पर होने वाले कुंभ में ऐसे स्नान के बाद पानी गंदा हो जाता  है, मगर प्रयागराज में यह अपवाद है। इसका जवाब तलाशने का प्रयास Newsfirst24 की टीम ने किया है।

भारत की पवित्रतम नदी गंगा सदियों से श्रद्धा, आस्था और वैज्ञानिक जिज्ञासा का केंद्र रही है। करोड़ों लोग इसमें स्नान करते हैं, लेकिन गंगाजल कभी खराब क्यों नहीं होता? यह सवाल वर्षों से वैज्ञानिकों के लिए एक पहेली बना हुआ था। अब नागपुर स्थित राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (NEERI) के वैज्ञानिकों ने इस रहस्य को उजागर कर दिया है।

गंगा के पानी में पाए जाने वाले बैक्टेरियोफेज (Bacteriophage) और टरपीन्स (Terpenes) जैसे प्राकृतिक तत्व इसे खुद-ब-खुद शुद्ध करने में मदद करते हैं। ये तत्व पानी में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट कर देते हैं, जिससे गंगाजल की गुणवत्ता बनी रहती है।

गंगाजल में आखिर ऐसा क्या है जो इसे “अमृत” बना देता है?

गंगाजल का वैज्ञानिक रहस्य: महाकुंभ में 28 करोड़ लोगों ने स्नान किया फिर ही क्यों मैली नहीं हुई गंगा

NEERI के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. कृष्णा खैरनार के अनुसार, गंगा के पानी में तीन प्रमुख विशेषताएँ पाई गईं, जो इसे दुनिया की दूसरी नदियों से अलग बनाती हैं:

✅ बैक्टेरियोफेज: ये सूक्ष्मजीव गंगा में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया को खत्म करते हैं और जल को स्वच्छ बनाए रखते हैं।
✅ फाइटोकेमिकल्स (टरपीन्स): ये प्राकृतिक यौगिक पानी में एंटी-बैक्टीरियल गुण उत्पन्न करते हैं और जल की शुद्धता को बरकरार रखते हैं।
✅ घुलित ऑक्सीजन (DO): गंगा के पानी में अन्य नदियों की तुलना में 20% अधिक ऑक्सीजन होती है, जो जल में किसी भी तरह की गंदगी को नष्ट कर देती है।

गंगा जल परीक्षण: वैज्ञानिकों ने किन-किन स्थानों से लिए सैंपल?

गंगाजल का वैज्ञानिक रहस्य: महाकुंभ में 28 करोड़ लोगों ने स्नान किया फिर ही क्यों मैली नहीं हुई गंगा

🔬 NEERI वैज्ञानिकों की टीम ने तीन अलग-अलग ऋतुओं में गंगाजल का विस्तृत अध्ययन किया। इस शोध के दौरान 50 से अधिक स्थानों से पानी के सैंपल इकट्ठा किए गए, जिनका वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया।

🔹 गौमुख से हरिद्वार: यह क्षेत्र गंगा के उद्गम का स्रोत है और सबसे शुद्ध जल यहीं पाया गया।
🔹 हरिद्वार से पटना: इस क्षेत्र में भी बैक्टेरियोफेज की मात्रा अधिक पाई गई।
🔹 पटना से गंगासागर: शोध में पाया गया कि जैसे-जैसे नदी आगे बढ़ती है, प्रदूषण बढ़ता है, लेकिन फिर भी पानी की शुद्धि क्षमता बनी रहती है।

100 साल पुरानी रिसर्च में भी था गंगा जल का जिक्र!

यह कोई नई खोज नहीं है! 1896 में ब्रिटिश वैज्ञानिक अर्नेस्ट हॉकिंस ने भी अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि गंगा के पानी में कुछ ऐसे तत्व मौजूद हैं, जो इसे सड़ने नहीं देते और जलजनित बीमारियों से बचाते हैं।

कुंभ में लाखों लोग स्नान करते हैं, फिर भी महामारी क्यों नहीं फैलती?

👉 हर 12 साल में लगने वाले कुंभ मेले में करोड़ों श्रद्धालु गंगा में स्नान करते हैं, लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार, गंगा मात्र 5-10 किलोमीटर के अंदर खुद को फिर से शुद्ध कर लेती है!

🚰 कैसे?
✅ बैक्टेरियोफेज और फाइटोकेमिकल्स गंगाजल को तुरंत साफ कर देते हैं।
✅ नदी का तेज प्रवाह गंदगी को बहाकर दूर कर देता है।
✅ घुलित ऑक्सीजन गंगाजल को रोगाणुरहित बनाए रखती है।

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गंगा की शुद्धता को बनाए रखने के लिए क्या करना चाहिए?

🔴 वैज्ञानिकों की मानें तो गंगा की शुद्धता को बनाए रखने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे:

✔ गंगा में कचरा और सीवेज डालने पर सख्त रोक लगे।
✔ नदी के प्राकृतिक प्रवाह को बनाए रखा जाए और बांधों का संतुलित उपयोग हो।
✔ गंगा जल में पाए जाने वाले प्राकृतिक तत्वों को बचाने के लिए प्रदूषण नियंत्रण कड़े किए जाएं।
✔ सरकार द्वारा चलाए जा रहे “नमामि गंगे” अभियान को और प्रभावी बनाया जाए।

वैज्ञानिकों का निष्कर्ष:

NEERI के अनुसार, गंगा का पानी केवल एक नदी का जल नहीं, बल्कि एक जटिल जैविक और भौतिक प्रक्रिया का परिणाम है। इसके पानी में मौजूद प्राकृतिक तत्व इसे “अमृत” जैसा गुण प्रदान करते हैं।

अगर इसे सही तरीके से संरक्षित किया जाए, तो गंगा भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी उतनी ही पवित्र और स्वच्छ बनी रह सकती है, जितनी यह प्राचीन काल से है।

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