नरेश सहारे, गढ़चिरोली
गढ़चिरौली के कुरखेड़ा उप-जिला अस्पताल की लापरवाही का मामला
गढ़चिरौली जिले के कुरखेड़ा उप-जिला अस्पताल में डॉक्टरों की कमी एक बार फिर एक मासूम की जान ले गई। 25 मार्च 2025 की सुबह 8 बजे, प्रसव के तुरंत बाद एक नवजात की हालत बिगड़ने लगी, लेकिन अस्पताल में कोई शिशु विशेषज्ञ (Pediatrician) मौजूद नहीं था। डॉक्टरों को बच्चे की स्थिति समझ नहीं आई और इलाज के अभाव में उसने दम तोड़ दिया।
मृत नवजात के माता-पिता गोंदिया जिले के अर्जुनी (तालुका कनेरी) के निवासी हैं। मां को 25 मार्च की सुबह 7:30 बजे प्रसव पीड़ा के चलते कुरखेड़ा अस्पताल लाया गया था। मात्र 15 मिनट में डिलीवरी हुई, लेकिन जन्म के तुरंत बाद नवजात की हालत बिगड़ने लगी। मौजूद डॉक्टरों ने असमर्थता जताते हुए कहा कि शिशु विशेषज्ञ की गैरमौजूदगी के कारण वे कुछ नहीं कर सकते।
बच्चे की मौत के बाद जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते डॉक्टर
मां सुरक्षित है, लेकिन बेटे को खोने का दर्द माता-पिता बर्दाश्त नहीं कर पा रहे। अस्पताल प्रशासन ने बच्चे की मौत के लिए परिजनों को ही दोषी ठहराया, यह कहकर कि अगर वे समय पर अस्पताल पहुंचते तो नवजात को बचाया जा सकता था।
सरकार स्वास्थ्य पर खर्च करती है करोड़ों, फिर भी डॉक्टर नहीं?
गढ़चिरौली जैसे आदिवासी बहुल जिले में हर साल करोड़ों रुपए स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च किए जाते हैं। लेकिन जब किसी मरीज को आपात स्थिति में मदद की जरूरत होती है, तो अस्पतालों में या तो डॉक्टर नहीं मिलते या सुविधाओं का अभाव होता है। सवाल यह उठता है कि अगर अस्पताल में शिशु विशेषज्ञ डॉक्टर मौजूद होते, तो क्या नवजात की जान बच सकती थी?
डॉक्टर का बयान—बच्चा पहले ही मृत था!
डिलीवरी करने वाले डॉक्टर का कहना है कि—
“बच्चे की स्थिति पहले से ही खराब थी। वह ब्रीच प्रेजेंटेशन (उल्टा जन्म) में था, उसका एक पैर अटका हुआ था और जन्म के समय उसकी गर्दन में गर्भनाल लिपटी हुई थी। बच्चा रोया भी नहीं। मरीज को पहले ही रेफर कर देना चाहिए था, लेकिन वे पीएचसी (केसोरी, गोंदिया) में प्राइवेट डॉक्टर पिंकू मंडल के इलाज में थे, जिन्होंने समय रहते सीजर (C-Section) करने की सलाह नहीं दी।”
मां-बाप का आरोप—अगर विशेषज्ञ डॉक्टर होता, तो बच्चा बच सकता था!
मृतक बच्चे के पिता प्रफुल चौरे का कहना है—
“हमने अपनी पत्नी का इलाज डॉ. पिंकू मंडल के पास कराया था। उन्होंने हमें भरोसा दिया था कि नॉर्मल डिलीवरी हो जाएगी। लेकिन जब पत्नी को ज्यादा दर्द होने लगा, तो डॉक्टर ने फोन नहीं उठाया। बाद में बोले कि वे मीटिंग में हैं, इसलिए सरकारी अस्पताल में चले जाओ। हमने ऐसा ही किया, लेकिन वहां सुविधाओं का अभाव था। जब हमने अस्पताल में डिलीवरी करवाई, तो डॉक्टर वीडियो कॉल पर किसी से निर्देश लेकर डिलीवरी कर रहे थे।”
“जब बच्चा पैदा हुआ, तो वह कुछ देर तक हलचल कर रहा था। लेकिन वहां न एनआईसीयू (NICU) था, न कोई विशेषज्ञ। अगर समय पर सही इलाज मिलता, तो हमारा बच्चा जिंदा होता।”
कौन है जिम्मेदार?
- सरकार—जो ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं पर करोड़ों खर्च करने के बावजूद डॉक्टरों की नियुक्ति नहीं कर पा रही।
- अस्पताल प्रशासन—जो मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने में असफल रहा।
- डॉक्टर—जो जिम्मेदारी से बचने के लिए मरीजों को इधर-उधर रेफर कर देते हैं।
- मरीज के परिजन—जो समय पर सही अस्पताल नहीं पहुंचे और पूरी तरह से प्राइवेट डॉक्टर पर निर्भर रहे।
अब सवाल यह है कि इस मौत के लिए कौन जवाबदेह है?
अगर स्वास्थ्य सेवाओं की यही स्थिति बनी रही, तो अगली बार फिर कोई मासूम जिंदगी समय से पहले खत्म हो जाएगी, और फिर वही बहाने—“हम कुछ नहीं कर सकते थे!”
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