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तेंदुए की खाल तस्करी के पीछे छत्तीसगढ़ कनेक्शन, वन विभाग की चुप्पी पर सवाल

तेंदुए की खाल तस्करी के पीछे छत्तीसगढ़ कनेक्शन, वन विभाग की चुप्पी पर सवाल

बेलगांव वन विभाग पर क्यों नहीं किया गया भरोसा?

By नरेश सहारे, Newsfirst24.in

Published: February 24, 2025, 09:16 PM

गढ़चिरौली |  महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में तेंदुए की खाल और अंगों की तस्करी के मामले ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस क्षेत्र में तस्करी हो रही थी, वहां के स्थानीय वन अधिकारियों पर भरोसा क्यों नहीं किया गया? आखिर ऐसा क्या था कि गोंदिया जिले के अर्जुनी वन विभाग को बेलगांव में कार्रवाई करनी पड़ी? क्या यह केवल संयोग था, या फिर इसके पीछे कोई बड़ा खेल चल रहा है?

छत्तीसगढ़ से जुड़ा तस्करी का तार, मुख्य आरोपी अब भी फरार

 तेंदुए की खाल तस्करी के पीछे छत्तीसगढ़ कनेक्शन, वन विभाग की चुप्पी पर सवालसूत्रों के अनुसार, तेंदुए की खाल की तस्करी करने वाले गिरोह का मास्टरमाइंड छत्तीसगढ़ का रहने वाला है। बेलगांव वन विभाग की एक टीम उसकी तलाश में छत्तीसगढ़ में छापेमारी कर रही है, लेकिन अब तक कोई सफलता नहीं मिली है। सवाल यह है कि आरोपी बार-बार हाथ से फिसल कैसे जा रहा है? क्या उसे किसी से अंदरूनी मदद मिल रही है?

बेलगांव वन अधिकारियों को कार्रवाई से क्यों रखा गया दूर?

वन विभाग से जुड़े कुछ सूत्रों का दावा है कि बेलगांव क्षेत्र पहले से ही अवैध गतिविधियों का गढ़ रहा है। यहां बैल तस्करी का एक बड़ा नेटवर्क काम करता है, जो जंगल के रास्ते से अवैध व्यापार करता है। लेकिन सवाल उठता है कि क्या बैल तस्करी की आड़ में वन्य जीवों की तस्करी भी होती रही है? अगर हां, तो यह तेंदुए की खाल की बरामदगी कोई इकलौता मामला नहीं है, बल्कि एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है।

वन विभाग के एक पूर्व अधिकारी, जिन्होंने नाम न छापने की शर्त पर बात की, उन्होंने बताया कि बेलगांव वन क्षेत्र में लंबे समय से अवैध शिकार की गुप्त सूचनाएं आती रही हैं, लेकिन हर बार मामला दबा दिया जाता है। कई बार स्थानीय अधिकारी कार्रवाई करने में सुस्ती दिखाते हैं, जिससे शिकारियों को बच निकलने का मौका मिल जाता है।

वन विभाग पत्रकारों से क्यों भाग रहा है?

तेंदुए की खाल की बरामदगी के बाद जब पत्रकारों ने वन विभाग के अधिकारियों से इस मामले में जानकारी लेने की कोशिश की, तो उन्हें कोई ठोस जवाब नहीं मिला। आखिर वन विभाग पत्रकारों से बचने की कोशिश क्यों कर रहा है?

वन विभाग के कुछ अधिकारियों का कहना है कि यह मामला उच्च अधिकारियों तक पहुंच चुका है, और इससे जुड़े कुछ नाम काफी प्रभावशाली हो सकते हैं। यही कारण है कि स्थानीय स्तर पर जानकारी छुपाई जा रही है।

क्या बेलगांव पहले से ही तस्करों का सुरक्षित ठिकाना बना हुआ है?

इस मामले ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या बेलगांव वन क्षेत्र पहले से ही वन्यजीव तस्करों का सुरक्षित अड्डा बना हुआ था? अगर ऐसा है, तो यह पहली बार नहीं है जब यहां तस्करी हो रही थी—बल्कि पहली बार इसे उजागर किया गया है।

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अब आगे क्या?

अब देखना होगा कि वन विभाग इस मामले में आगे क्या कदम उठाता है। क्या गोंदिया की अर्जुनी टीम आगे की जांच जारी रखेगी, या फिर बेलगांव वन विभाग को दोबारा इसकी जिम्मेदारी दी जाएगी?

लेकिन एक बात तय है—यह मामला जितना खुल रहा है, उतना ही उलझता जा रहा है। अगर सही जांच नहीं हुई, तो तस्करों का यह खेल चलता रहेगा, और अगली बार शायद कोई बड़ी वन्यजीव तस्करी की घटना सामने आए।

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