मुस्लिम समाज ने संत गजानन महाराज पालखी का किया भव्य स्वागत, 14 वर्षों से जारी है परंपरा
जालना। मजहर पठाण
महाराष्ट्र के जालना शहर में एक बार फिर सांप्रदायिक सौहार्द और एकता की अद्भुत मिसाल देखने को मिली। नूतन वसाहत क्षेत्र में जब संत श्री गजानन महाराज की पालखी पहुंची, तो मुस्लिम समाज के लोगों ने पारंपरिक उत्साह के साथ उसका स्वागत किया। यह परंपरा वर्ष 2011 में शुरू हुई थी और आज 14वें वर्ष में भी पूरी श्रद्धा से निभाई जा रही है।
परंपरा जो जोड़ती है दिलों को
संत गजानन महाराज की पालखी हर वर्ष आषाढ़ी एकादशी के बाद पंढरपुर से लौटते समय जालना के नूतन वसाहत इलाके में पहुंचती है। यहां मुस्लिम समाज के लोग वारकऱियों का स्वागत कर अपनी एकता की परंपरा को निभाते हैं। फूलों की वर्षा, पुष्पगुच्छ और आत्मीयता से किए गए सत्कार ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक और भावुक बना दिया।
फूलों की वर्षा से हुआ स्वागत, नेताओं और कार्यकर्ताओं की सहभागिता
पालखी के आगमन पर माजी विधायक कैलास गोरंट्याल और समाजसेवी शेख इब्राहीम शेख रसूल ने स्वयं आगे आकर सभी वारकऱियों पर फूलों की वर्षा की और उनका पुष्पगुच्छ देकर सत्कार किया। इस अवसर पर नारायण वाडेकर, शेख इर्शद, आसिफ पठान, जमील शेख, अझहर शेख, बाबासाहेब सोनवणे, अलीम शेख, अमोल भोसले और आदिल चाऊस सहित बड़ी संख्या में मुस्लिम समाज के नागरिक उपस्थित रहे।
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भाईचारे का संदेश, वारकऱियों ने जताया आभार
पालखी के स्वागत से प्रभावित होकर कई वारकऱियों ने कहा कि जालना जैसे शहर में इस प्रकार के आत्मीय स्वागत से उन्हें संतों की परंपरा की सच्ची अनुभूति होती है। यहां केवल धार्मिक आयोजन नहीं हुआ, बल्कि समाज के दो समुदायों ने मिलकर प्रेम और भाईचारे का संदेश दिया।
छोटे बच्चों से बुजुर्गों तक ने निभाई सहभागिता
इस आयोजन में खास बात यह रही कि मुस्लिम समाज के छोटे-छोटे बच्चे भी फूलों की टोकरी लेकर पालखी के स्वागत के लिए खड़े थे। बुजुर्गों के चेहरे पर श्रद्धा और बच्चों के चेहरे पर उल्लास—यह दृश्य हर किसी को भावुक कर गया।
एकता और सौहार्द का अनमोल उदाहरण
जालना में हुआ यह आयोजन सिर्फ एक धार्मिक घटना नहीं, बल्कि गंगा-जमुनी तहज़ीब की जीती-जागती मिसाल है। जब एक समाज दूसरे समाज की श्रद्धा और परंपरा का खुले मन से सम्मान करता है, तब सच्चे भारत की तस्वीर उभरती है।
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