रिपोर्ट: नरेश सहारे | दिनांक: 28 जनवरी 2025
सुरजागढ़ और हेदरी परियोजना विस्तार को लेकर हुई थी जनसुनवाई
गढ़चिरौली। गढ़चिरौली जिले में सुरजागढ़ और हेदरी परियोजना विस्तार को लेकर जिला योजना समिति सभाकक्ष में जनसुनवाई आयोजित की गई। इस जनसुनवाई में स्थानीय नागरिकों, जनप्रतिनिधियों और लॉयल्ड मेटल्स एंड एनर्जी लिमिटेड कंपनी के अधिकारियों की मौजूदगी रही। लेकिन यह जनसुनवाई मात्र औपचारिकता बनकर रह गई और जनता की समस्याओं की अनदेखी की गई। स्थिति कुछ ऐसी रही कि “राजा बोले, दाढ़ी हाले” की कहावत सच होती दिखी।
सुरजागढ़ परियोजना विस्तार का प्रस्ताव

लॉयल्ड मेटल्स एंड एनर्जी लिमिटेड कंपनी फिलहाल 348.09 हेक्टेयर में लौह अयस्क खनन कर रही है, जिसमें 10 से 26 मिलियन टन प्रतिवर्ष हेमेटाइट, 45 मिलियन टन प्रतिवर्ष (बीएचक्यू प्लांट) और 5 मिलियन टन प्रति वर्ष ठोस अपशिष्ट का उत्पादन किया जा रहा है। अब कंपनी इस क्षेत्र में क्रशिंग और स्क्रीनिंग प्लांट सहित उत्पादन क्षमता का विस्तार करना चाहती है। महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के चंद्रपुर कार्यालय ने इस मुद्दे पर सार्वजनिक सुनवाई आयोजित करने का निर्णय लिया। एटापल्ली तालुका के नागुलवाड़ी, मोहरली, करमपल्ली, एकरा खुर्द, ज़रेवाड़ा, पेठा, मरकल, रेकनार, अलदंडी, परसालगोंडी, पुरसालगोंडी, हेदरी, बांदे, मुंगेर, गोडेल, इटालनार, सुरजागड़, नेंदर और मल्लम पहाड़ी के गांव इस परियोजना के प्रभाव क्षेत्र में आते हैं।
जनसुनवाई में आदिवासियों की नाराजगी

इस जनसुनवाई में लगभग 13 गांवों के नागरिकों की उपस्थिति रही। आदिवासी महिलाएं अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ 150 किलोमीटर की दूरी तय कर जनसुनवाई में शामिल हुईं। उनकी आँखों में नाराजगी साफ दिख रही थी। जनसुनवाई के दौरान आदिवासी समुदाय के लोग आपस में कानाफूसी कर रहे थे, लेकिन उनकी आवाज़ को अनसुना किया गया। स्थिति यह थी कि गार्डों ने उन्हें इस तरह घेरा हुआ था, जैसे वे किसी बैल के बाड़े में बंद हों।
राजनीतिक नेतृत्व की चुप्पी
जनसुनवाई में गढ़चिरौली जिले के सांसद नामदेव किरसान, अहेरी विधानसभा क्षेत्र के विधायक धर्मरावबाबा अत्राम, गढ़चिरौली के भाजपा विधायक मिलिंद नरोटे और आरमोरी के विधायक रामदास मसराम उपस्थित थे। आश्चर्य की बात यह रही कि सांसद नामदेव किरसान, जिन्होंने पहले कोरची तालुका के झेंडेपार आयरन माइन की जनसुनवाई में पेसा अधिनियम के तहत कड़ा विरोध जताया था, इस बार पूरी तरह चुप नजर आए। यह दर्शाता है कि निर्वाचित होने के बाद जनप्रतिनिधि पेसा कानून और जनता की समस्याओं को भूल जाते हैं।
लॉयल्ड मेटल्स: विकास या निजी स्वार्थ?
लॉयल्ड मेटल्स कंपनी ने सुरजागढ़ और कोनसरी में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं देने की शुरुआत की है, ताकि जनता और सरकार का ध्यान उनकी गतिविधियों पर कम जाए और काम सुचारू रूप से चलता रहे। लेकिन यह भी सच है कि कंपनी ने अपने हित साधने के लिए स्थानीय गैंगस्टरों और शराब तस्करों से हाथ मिला लिया है। इस कारण न सिर्फ कानून-व्यवस्था प्रभावित हो रही है, बल्कि गरीबों के लिए न्याय पाना भी मुश्किल हो रहा है।
सरकारी विकास निधि कहां जा रही है?
जनसुनवाई में लोगों ने सवाल उठाया कि जब जिले के विकास के लिए हर साल डीपीटीसी (जिला योजना समिति) के तहत करोड़ों रुपए मंजूर होते हैं, तो फिर बुनियादी सुविधाओं के लिए कंपनी पर निर्भर क्यों रहना पड़ रहा है? अगर सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सुविधाएं सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जानी चाहिए, तो फिर इस क्षेत्र का विकास फंड आखिर जा कहां रहा है?
सुरजागढ़ परियोजना से बढ़ती पर्यावरणीय समस्याएं
सुरजागढ़ पहाड़ी के आसपास के गांवों में पर्यावरणीय क्षति बढ़ती जा रही है। लाल पानी खेतों में घुसकर किसानों की फसलें बर्बाद कर रहा है, जिससे किसान खेती करने में असमर्थ हो गए हैं। हालात इतने खराब हैं कि अगर कोई आदिवासी गरीब मरता है, तो उसे जलाने के लिए लकड़ी तक नसीब नहीं होती।
सड़कें खस्ताहाल, लेकिन जिम्मेदारी कौन लेगा?
खनन के कारण अलापल्ली से आष्टी मार्ग तक की सड़कें पूरी तरह खराब हो चुकी हैं। कंपनी की हजारों गाड़ियां रोज इन सड़कों पर दौड़ती हैं, जिससे कई हादसे हो रहे हैं। कंपनी दुर्घटना के बाद 25 लाख रुपए का मुआवजा देकर मामले को रफा-दफा कर देती है। लेकिन सवाल यह है कि जो सड़कें कंपनी की वजह से बर्बाद हुईं, उनकी मरम्मत कौन करेगा? कंपनी के एमडी प्रभाकरण का कहना है कि वन विभाग की अनुमति के कारण सड़क निर्माण कार्य रुका हुआ है, लेकिन स्थानीय लोगों को यह सिर्फ बहाना नजर आता है।
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क्या वाकई जिले को फायदा हो रहा है?
लॉयल्ड मेटल्स कंपनी 2007 में जिले में आई थी और शुरू में उसे काफी संघर्ष करना पड़ा। नक्सली गतिविधियों के चलते कंपनी को नुकसान उठाना पड़ा और उसकी सैकड़ों गाड़ियों को नुकसान पहुंचाया गया। लेकिन समय के साथ कंपनी ने अपने प्रभावशाली संबंध बना लिए और अब खनन गतिविधियां निर्बाध रूप से जारी हैं। हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया में स्थानीय आदिवासियों को कोई विशेष लाभ नहीं हुआ है, बल्कि उनकी जमीन, पानी और हवा ही दूषित हो रही है।
कंपनी अपने हितों को साधने में लगी हुई
गढ़चिरौली में हुई इस जनसुनवाई ने यह साफ कर दिया कि लॉयल्ड मेटल्स कंपनी की खदान परियोजना स्थानीय लोगों के लिए समस्या बनती जा रही है। सरकारी विकास निधि का कोई स्पष्ट उपयोग नहीं दिखता, जबकि कंपनी अपने हितों को साधने में लगी हुई है। आदिवासियों के पास विरोध दर्ज कराने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है, लेकिन उनकी आवाज़ दबाई जा रही है। ऐसे में यह बड़ा सवाल खड़ा होता है कि विकास के नाम पर आखिर किसका भला हो रहा है – स्थानीय जनता का या सिर्फ चंद उद्योगपतियों और राजनेताओं का?











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