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राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज नागपुर यूनिवर्सिटी (Nagpur University) के पूर्व कुलगुरू डॉ. सुभाष चौधरी पर लगातार करोड़ों के घोटाले में शामिल होने के आरोप लगे। हालांकि जब वह बीमार हुए और 25 सितंबर को उनका निधन हो गया उस समय उनके और परिवार के पास इलाज करवाने तक के पैसे नहीं थे। उनके साथी प्रोफेसर और कर्मचारियों ने चंदा कर अस्पताल का बिल भुगतान किया।
वे लगातार दबाव में थे, मगर किसी को बताया नहीं
NewsFirst24.in को मिली पुख्ता जानकारी के अनुसार डॉ. चौधरी कुछ महीनों से भयंकर दबाव में थे। उन पर प्रेशर था कि वह यूनिवर्सिटी में होने वाली नियुक्तियों की एक ऐसी सूची पर साइन करें जिनके नाम पहले से मैनेज थे। इसके लिए उन्हें पहले मुंबई में सरकार के आला पदों पर बैठे लोगों ने बुलाया और फिर उन्हें इसमें सहमति देने को कहा।
डॉ. चौधरी पर यह आरोप लगे थे
नागपुर विवि के पूर्व कुलगुरू डॉ. चौधरी के खिलाफ शिकायतों की जांच कर अजीत बाविस्कर की समिति ने अपनी रिपोर्ट में आरोप लगाया था कि डॉ. चौधरी ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग किया है। एमकेसीएल को लेकर सरकार के आदेशों की अनदेखी की। एमकेसीएल को करोड़ों का फायदा पहुंचा गया। महाराष्ट्र नॉलेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एमकेसीएल) को परीक्षा कार्य के लिए चुना गया था मगर कांट्रेक्ट गैर-निविदा वालों को दिया गया।
दबाव में थे इसलिए बात करना ही बंद कर दी थी
डॉ. चौधरी के नजदीकियों ने बताया कि डॉ. चौधरी पर इतना दबाव था कि उन्होंने अपने आस-पास के लोगों से बात करना तक बंद कर दिया था। उन्हें आए दिन दबाव के लिए फोन आते थे। इसलिए उन्होंने फोन उठाना तक बंद कर दिए।
हाई कोर्ट ने निलंबन को गलत बताया था
21 फरवरी 2024 को राज्यपाल ने डॉ. चौधरी को पहली बार निलंबित किया था। वे इसके खिलाफ हाई कोर्ट गए। कोर्ट ने डॉ. सुभाष चौधरी निलंबन को गलत बताते हुए फैसला रद्द किया था। इसके चलते 11 अप्रैल को डॉ. चौधरी ने नागपुर विश्वविद्यालय के कुलगुरु का फिर से कार्यभार संभाला। लेकिन कार्यभार संभालते ही डॉ. चौधरी पर जांच बैठाई गई। राज्यपाल ने 4 जुलाई को डॉ. चौधरी को दूसरी बार फिर निलंबित किया था। इस मामले में कार्रवाई शुरू थी। इस दौरान उनका अचानक निधन हो गया।
उनसे कहा गया सहमति देने पर सारे आरोप वापस ले लिए जाएंगे
डॉ. सुभाष चौधरी को मुंबई में बैठे एक उच्च पदस्थ अधिकारी ने नागपुर की एक अन्य यूनिवर्सिटी के काउंसिल मेंबर को उनके पास संदेश लेकर भेजा था। जिसमें कहा गया था कि यदि वे नियुक्ति सहित यूनवर्सिटी के कुछ ठेकों पर सहमति दे देते हैं तो उन पर लगे सभी आरोपों को वापस ले लिया जाएगा। उनकी जांच में बंद हो जाएगी। हालांकि उन्होंने इससे इनकार कर दिया था।















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