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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस विशेष: संघर्ष की मिसाल बनीं सुशीलाबाई, फुटपाथ पर चप्पल सिलकर बनाई अपनी दुनिया

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस विशेष: संघर्ष की मिसाल बनीं सुशीलाबाई, फुटपाथ पर चप्पल सिलकर बनाई अपनी दुनिया

By कुंवरचंद मंडले
Published: march 08, 2025, 02:43 PM

International Women’s Day Special: Sushilabai became an example of struggle, created her own world by stitching slippers on the footpath

नांदेड़, महाराष्ट्र: कहते हैं कि अगर इरादे मजबूत हों और हौसलों में दम हो, तो कोई भी मुश्किल जिंदगी का रास्ता रोक नहीं सकती। ऐसी ही प्रेरणादायक कहानी है नांदेड़ शहर की 57 वर्षीय सुशीलाबाई नागोराव हराले की, जिन्होंने पति की मौत के बाद फुटपाथ पर बैठकर चप्पल-जूते सिलने का काम शुरू किया और अपने परिवार को गरीबी के अंधेरे से निकालकर आत्मनिर्भरता की रोशनी तक पहुंचाया।

पति का साया छूटा, दो बच्चों का भविष्य अंधकार में डूबा

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस विशेष: संघर्ष की मिसाल बनीं सुशीलाबाई, फुटपाथ पर चप्पल सिलकर बनाई अपनी दुनियासुशीलाबाई का जीवन पहले से ही संघर्षों से भरा था। उनके पति नागोराव हराले मोची का काम करते थे, जबकि सुशीलाबाई लोगों के घरों में काम कर परिवार चलाने में मदद करती थीं। लेकिन करीब 15 साल पहले पति का देहांत हो गया, जिससे उनके जीवन में अंधेरा छा गया। घर में दो छोटे बच्चे, एक बेटा और एक बेटी — कंधों पर जिम्मेदारियों का पहाड़ टूट पड़ा।

संकट के समय समाज ने मोड़ा मुंह, पर सुशीलाबाई नहीं टूटीं

पति के जाने के बाद परिवार और समाज से कोई मदद नहीं मिली। रिश्तेदारों ने भी मुंह मोड़ लिया। लेकिन सुशीलाबाई ने हार मानने की बजाय अपने पति के काम को आगे बढ़ाने का फैसला किया। वह फुटपाथ पर बैठकर जूते-चप्पल सिलने का काम करने लगीं। शुरू-शुरू में समाज के लोग उन पर हंसते थे, ताने कसते थे — “औरत होकर चप्पल सिल रही है?” लेकिन सुशीलाबाई ने किसी की परवाह नहीं की।

उनका एक ही उद्देश्य था — अपने बच्चों को पढ़ाना, उनका भविष्य संवारना और खुद को आत्मनिर्भर बनाना। बिना किसी झिझक के, बिना किसी शर्म के, उन्होंने गर्मी, बरसात और ठंड की परवाह किए बिना फुटपाथ पर बैठकर चप्पलें सिलनी शुरू कर दीं।

पुरुषों के वर्चस्व को तोड़कर बनाया नया मुकाम

जूते-चप्पल सिलने का काम आमतौर पर पुरुषों द्वारा किया जाता है, लेकिन सुशीलाबाई ने इस धारणा को तोड़ते हुए पुरुषों के वर्चस्व वाले क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई। शुरुआत में लोग ताने कसते थे, लेकिन जब उन्होंने देखा कि एक महिला अकेले मेहनत कर बच्चों को पढ़ा रही है, घर चला रही है और समाज के दबाव को झेल रही है, तब लोग उनके साहस को सलाम करने लगे।

परिश्रम से बनाया घर, बच्चों को पढ़ाया और बेटी की शादी की

लगातार संघर्ष करते हुए सुशीलाबाई ने न केवल अपने बच्चों को पढ़ाया, बल्कि अपनी बेटी की शादी भी कराई। वह हर रोज आठ घंटे फुटपाथ पर बैठकर चप्पल-जूते सिलतीं और रोजाना करीब 300 से 400 रुपये कमातीं। महीने के 9 से 10 हजार रुपये से वह अपना और अपने बच्चों का खर्च चलातीं।

धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाई। किराए के मकान में रहने वाली सुशीलाबाई ने इसी कमाई से खुद का मकान बना लिया। आज वह न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि समाज के लिए एक प्रेरणा भी बन चुकी हैं।

हौसले ने बदली जिंदगी, आज समाज कर रहा है सलाम

आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर सुशीलाबाई जैसी महिलाओं की कहानी यह साबित करती है कि अगर इरादे मजबूत हों और हौसला बुलंद हो, तो कोई भी परिस्थिति आपको नहीं तोड़ सकती। उन्होंने यह साबित कर दिया कि एक महिला अकेले भी परिवार चला सकती है, घर बना सकती है और समाज के तानों का मुंहतोड़ जवाब अपने काम से दे सकती है।

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संदेश: हर महिला में है असीम शक्ति

सुशीलाबाई की कहानी उन हजारों महिलाओं के लिए प्रेरणा है, जो किसी कठिन परिस्थिति में फंसकर हार मान लेती हैं। उन्होंने समाज के दबाव को नजरअंदाज कर अपनी पहचान बनाई। आज वह न केवल अपने बच्चों का भविष्य संवार चुकी हैं, बल्कि समाज को यह संदेश भी दे चुकी हैं कि — अगर हौसला हो, तो कोई भी मुश्किल जिंदगी की गाड़ी को रोक नहीं सकती।

सुशीलाबाई कहती हैं:
“लोगों ने मेरा मजाक उड़ाया, लेकिन मैंने कभी ध्यान नहीं दिया। मैं बस यह जानती थी कि अगर मैं काम नहीं करूंगी, तो मेरे बच्चे भूखे रह जाएंगे। आज मैं गर्व से कह सकती हूं कि मैंने अपनी मेहनत से सबकुछ हासिल किया।”

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर सलाम, उन सभी महिलाओं को जो संघर्ष करके इतिहास लिखती हैं।

सुशीलाबाई हराले – एक मिसाल, एक प्रेरणा।

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